“ब्रज चौरासी कोस में… चार गाँव निज धाम, वृन्दावन और मधुपुरी, बरसानो, नंदगाँव”
ब्रज की धरती को उसका खोया हरापन लौटाने का संकल्प।
84 कोस का पवित्र क्षेत्र
श्री कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा के आसपास लगभग 84 कोस (252 किलोमीटर) का पवित्र क्षेत्र ब्रज कहलाता है। यह लगभग 5,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अतिरिक्त राजस्थान के डीग जिले और हरियाणा के होडल को भी स्पर्श करता है।
ब्रज शब्द का अर्थ है वह धरती जहाँ ब्रह्म की चरण रज बिखरी है। इस क्षेत्र का हर कोना श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा है — वनों से, पर्वतों से, और सरोवरों से।
प्राचीन काल में यहाँ 12 प्रमुख वन थे — वृंदावन, मधुवन, कुमुदवन, तालवन, बहुलावन, काम्यवन, खदिर वन, भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन, लोहवन और महावन। इन वनों में, इन सरोवरों के किनारे, इन पहाड़ियों की छाया में कृष्ण ने अपनी बाल-लीलाएँ कीं।
आज वही वन उजड़ रहे हैं। जहाँ कभी घने कुंज थे, वहाँ कंक्रीट है। जहाँ कभी स्वच्छ सरोवर थे, वहाँ कूड़े के ढेर हैं।
जो वन कभी कृष्ण की लीलाभूमि थे, वे आज उजड़ रहे हैं।
- ब्रज क्षेत्र में वन संरक्षण कम, कंक्रीटीकरण अधिक हो रहा है।
- असंख्य प्राचीन सरोवर और कुंड अतिक्रमण और कचरे की भेंट चढ़ गए हैं।
- पर्वतों को खनन माफिया ने हानि पहुँचाई है।
- वृक्षारोपण की बड़ी परियोजनाएं लगती हैं, लेकिन पौधों की देखभाल के लिए न बजट है, न जिम्मेदारी।
- गाँवों के युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
“एक तरफ वनों का उद्धार आवश्यक है, दूसरी ओर इनकी रखरखाव की व्यवस्था और भी जरूरी है।”
तीन स्तंभ, एक लक्ष्य
हमारा मानना है कि ब्रज की असली उन्नति इन तीनों के संगम में है।
आस्था
आस्था हमें जड़ों से जोड़ती है — यह भूमि केवल पर्यटन का स्थान नहीं, श्री राधा-कृष्ण का निज निवास है। जब अपनापन हो, तो रखरखाव की भावना अपने-आप आती है।
पर्यावरण
पर्यावरण हमें जीवन देता है — वन, सरोवर, और पर्वत केवल धार्मिक महत्व के नहीं, पारिस्थितिक संतुलन के लिए अनिवार्य हैं।
ग्राम विकास
ग्राम विकास हमें भविष्य के लिए तैयार करता है — चौरासी कोस यात्रा से जुड़े हर गाँव के युवाओं को स्वरोजगार से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण को टिकाऊ बनाना।
हमारा समाधान सरल है: पेड़ लगाने और उनकी 3 साल तक देखभाल करने की जिम्मेदारी स्थानीय युवाओं को दो — और उसके बदले उन्हें उचित आय दो। इससे दो काम एक साथ होते हैं: प्रकृति की सेवा और युवाओं की आजीविका।
इस्पात भारती फाउंडेशन
यह पहल इस्पात भारती फाउंडेशन, गाजियाबाद के माध्यम से आगे बढ़ रही है, जिसकी प्रेरणा ब्रज चौरासी कोस की यात्रा और वहाँ के वनों, सरोवरों और गाँवों की दशा देखकर हुई।
हम सरकार से अनुरोध और अपील करते हैं — लेकिन प्रतीक्षा में नहीं बैठते। हमारा विश्वास है कि स्थानीय युवाओं द्वारा स्वरोजगार से ब्रज के वनों और तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार और रखरखाव संभव है।
यह प्रयास यदि ब्रज में सफल हुआ, तो यह विकसित भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया को एक नई दिशा दे सकता है।
एक ऐसा ब्रज जहाँ —
- चौरासी कोस के हर मार्ग पर घने वृक्षों की छाया हो
- हर सरोवर स्वच्छ और संरक्षित हो
- हर गाँव का युवक पर्यावरण संरक्षण से अपनी आजीविका कमाए
- तीर्थयात्री और पर्यटक स्वच्छ, हरे-भरे, और जीवंत ब्रज का अनुभव करें
- और हर लगाया गया पेड़ — हर वृक्षमित्र के नाम पर — डिजिटल मानचित्र पर जीवित दर्ज हो